सोचती हूं अगर कभी फिर से हम टकराए तो क्या कहूंगी:- दिव्या शर्मा

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सोचती हूं अगर कभी फिर से हम टकराए तो क्या कहूंगी,
बिना कुछ बोले निकाल जाऊंगी या तेरा चेहरा ताकती रहूंगी…
क्या तुझे बताऊंगी कैसी रही तुझ से जुड़ा होके मैं,
या एक बार फिर से अकेले ही सब सह जाऊंगी…
शायद चुप रहूंगी
दिल चाहेगा तुझे एक बार फिर से गले से लगा लू,
फिर रात भर तेरे साथ बैठू और दिल पर लगा हर ज़ख्म दिखा दूं…
थाम लूं तेरे हाथों को कुछ पल के लिए तुझे अपना बना लू,
एक बार फिर तेरी आंखों में खो जाऊं बस कुछ देर के लिए…
पहले की तरह तेरे सीने पर सो जाऊं,
दिल चाहेगा फिर से तेरी हो जाऊं…
पर शायद मै कुछ ना कहुंगी
आंखो को झुका के, इस दिल को समझा कर ख़ुद को रोक लूंगी,
आये अगर कुछ आंसू उन्हें पलकों पर ही समेट लूंगी…
सोचती हूं अगर फिर से हम टकराए तो क्या कहूंगी…!
शायद चुप रहूंगी…!!
शायद चुप रहूंगी…!!!
दिव्या शर्मा
रावतभाटा, कोटा।